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छुपी हुई सज़ाएं, ख़ामोश लम्हों में रहती हैं,हर बात की सदा, अब धड़कनों में बहती है।

कभी जो चाँद सा था, वो चेहरा क्यों बुझा सा है,रातें भी अब तो जैसे, तेरी रूह से डरती हैं।
क़दमों की आहटें भी, अब खौफ़ में बदलती हैं,वो कौन है जो साये की तरह, रूह में पलती है?
वो दर्द जो ज़ुबां तक ना आया, बस आँखें कह गईं,सच की तलाश में कई, साँसे भी जलती हैं।
जो देखा था कभी ख्वाबों में, अब डर बन गया है,तेरी मोहब्बत की किस्मत में, बस चोटें लिखी रहती हैं।

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authorxanshi

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